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शनिवार, अक्तूबर 01, 2011

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काव्य मंच : अलग-अलग कवि, लेखक, व्यंगकार, द्वारा लिखित रचनाओं को संकलित करने का एक ज़रिया

काव्यांजली
धीरेन्द्र सिंह भादुरिया

प्यारे बच्चों...

भारत माँ के प्यारे बच्चों,तुम्ही तो कर्णधार हो
तुम्ही हो राष्ट्र के रक्षक तुम भारत के प्यार हो,

आने वाले कल में तुम हो आज से ही जुट जाओ
कल आने के पहले ही तुम करके कुछ दिखलाओ,

सबसे पहले पढ लिखकर जीवन में बढ़ना सीखो
लक्क्ष बनाकर तुम अपना पीछे मुड़कर मत देखो,

फिर तुम सेवा करो राष्ट्रकी अपना नाम कमाओगे
मात पिता के साथ साथ भारत का मान बढाओगे
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मनीष कुमार 'नीलू'
कसक
  कुछ लम्हें कचोटता है
  वो खुलकर मिलने का
  कांधे पे रख के हाथ
  तेरे साथ चलने का...।



वो शाम सिंदूरी में
नदी तट पे टहलने का
भूल जाते थे हमतुम
जो सूरज ढलने का...।

बंद जो करती थी
आंखे मेरी तू झट से...
मैं पहले ही जान लेता था,
तेरे कदमों की आहट से...

फिर भी अनजान होकर,
तेरे हाथो को टटोलता था
अपनी दबी आरजू को
हौले से उड़ेलता था।

आज भी तेरी खातिर
मेरा मन तड़पता है
हर तरफ मुझे अब,
सन्नाटा दिखता है
हर ख्वाब भी रातों को
उपहास ही करता है...।

गम है तुम्हे पाकर
फिर से खोने का...
कितना असर है जीवन में,
तेरे ना होने का...
फर्क तो होगा ही
अंधेरा होने का...
फिर इंतजार है आखों को
एक सवेरा होने का...।


जब- जब हवा में
पर्दा हिलता है,
तेरे आने की आहट से
दीया उम्मीद का जलता है
फिर बुझ जाता है पल भर में,
सिर्फ एक साया दिखता है...।

अब व्याधूत मन मेरा
बुला रहा है थककर
कब रहगुजर होगी
तुम अपने प्रेम पथ पर...?
मैं प्रतीक्षारत हूं आज भी
खिड़की से लगकर...
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सोनल रस्तोगी
मैं कुंदन हो जाउंगी
एक दिन पूरा तप जाउंगी
सच मैं कुंदन हो जाउंगी
जिस दिन तुमसे छू जाउंगी
हाँ मैं चन्दन हो जाउंगी
मीठे तुम और तीखी मैं
तुम पूरे और रीती मैं
तुम्हे लपेटूं जिसदिन तन पर
मन से रेशम हो जाउंगी
नेह को तरसी नेह की प्यासी
साथ तुम्हारा दूर उदासी
फैला दो ना बाहें अपनी
सच मैं धड़कन हो जाउंगी
मंथर जीवन राह कठिन है
इन बातों की थाह कठिन है
तुम जो भर दो किरणे अपनी
सच मैं पूनम हो जाउंगी
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नूतन
मैं थी मैं हूँ मैं ......

दुआओं के धागे बाँध
मैं अदृश्य नहीं थी
मैं हवाओं में थी
मैं पत्तों के कम्पन में थी
जहाँ जहाँ मैं नहीं थी
वहाँ वहाँ मैं थी ....

मुझे ढूंढना वक़्त गंवाना है
क्योंकि मैं वक़्त वक़्त में हूँ
मैं उसकी आहट हूँ
कभी मुस्कान
कभी अजान
कभी आह्वान .....
तुम क्यूँ हो अनजान
इतने परेशान
मैं थी मैं हूँ मैं ......
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डॉ. शरद सिंह
ये जीवट वाली औरतें
सुबह होते ही लगभग हर दूसरे-तीसरे घर में प्रतीक्षा होने लगती है उस जीवट औरत की जो आमतौर पर कामवाली बाई के नाम से जानी जाती है। चाहे उसे उसके नाम से पुकारा जाए, चाहे उसे कोई नाम दे दिया जाए किंतु इससे कामवाली बाइयों का महत्व कम नहीं होता है। यदि वह समय पर नहीं आती है तो मालकिन का मानसिक तनाव सिर चढ़कर बोलने लगता है। देर-सबेर उसके आते ही यह तनाव फट पड़ता है। इतनी देर से क्यों आई? आज फिर कोई बहाना? यदि ऐसे ही देर किया करोगी तो तुम्हारी छुट्टी मैं कोई और कामवाली ढूंढ़ लूंगी! ऐसे न जाने कितने वाक्य हैं जो कामवाली कहलाने वाली औरतों को आए दिन सुनने पड़ते हैं।

   कामवाली बाइयों को डांटते-फटकारते समय शायद ही किसी को याद रहता हो कि उनका भी घर परिवार है और उन पर भी ढेरों जिम्मेदारियां हैं। यदि वह चुपचाप मालकिन के मनोनुकूल काम करती रहे तो सब ठीक है लेकिन जहां उसने एक भी गड़बड़ की तो उसके साथ कहा सुनी तय रहती है। यदि किसी कार्यालय में काम करने वाली महिला अपने कार्यालय में देर से पहुंचती है तो वह पूरी आशा रखती है कि उसके अधिकारी को उसके प्रति दयाभाव दिखाना चाहिए और उसकी लेटलतीफी को अनदेखा कर देना चाहिए लेकिन कामवाली बाई की लेटपतीफी सहनीय नहीं होती है।

   बहरहाल, एक ओर जिनके तीन-चार बच्चे हों (या इससे भी अधिक) कम या अनिश्चित आमदनी वाला पति हो, सास-ससुर, ननद-देवर यानी भरा-पूरा परिवार हो, वह अलस्सुबह जागकर पहले अपने घर के काम निपटाती है फिर चल पड़ती है चार पैसे कमाने की जुगत में। उसकी लालसा रहती है कि उसे अधिक से अधिक घरों में काम मिल जाए ताकि कुछ अधिक पैसे कमा सके।

पहले घर में पहुंच कर वह झाडू लगाती है, बरतन मांजती है, यदि कपड़े धोने का काम भी साथ में है तो कपड़े भी धोती है, फिर भोजन पकाती है। भोजन पकाने के बाद उसे खाने की मेज पर या फ्रिज में रखने के बाद उसके काम की समाप्ति होती है। यही क्रम दूसरे घर में रहता है। फिर तीसरे, चौथे, पांचवें अर्थात जितने घरों में वह काम करती है, यही सारी काम उसे करने होते हैं। एक ही काम को बार-बार दोहराते हुए न तो उसे बोर होने का समय रहता है और न अधिकार। पैसे कमाने हैं तो काम तो करना ही पड़ेगा। सुबह से शाम तक या लगभग रात तक कामवाली बाई का दायित्व निभाने के बाद जब वह थकी-हारी अपने घर लौटती है तो अकसर उसे हिस्से में ही आते हैं उसके अपने घर के काम-काज। इस व्यस्ततम दिनचर्या में जिस भी घर में पहुंचने में उसे देर हो जाती है वहां चार बातें सुनने को मिलती हैं।

देर होने का कारण भले ही छोटा क्यों न हो, उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताना उसकी विवशता हो जाती है ताकि मालकिन पसीज जाए और उसे काम से निकालने के बारे में न सोचे। वह सच है कि शहरों में अब कामवाली बाइयों की यूनियनें गठित होने लगी हैं। राज्य सरकारें भी उसके अधिकारों और सम्मान के बारे में सजग हो चली है। लोकसभा में महिला एवं बालविकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल में लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण संबंधी विधेयक 2010 पटल पर रखा गया था। यद्यपि इसमें घरेलू नौकरानियों के दैहिक शोषण के संबंध में स्पष्ट व्याख्या नहीं थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घरों में काम करने वाली महिलाओं को कामवाली बाई के बदले बहन जी अथवा दीदी के संबोधन से पुकारने की अपील की। उनका मानना है कि इससे घरेलू काम-काज करने वाली औरतों के सम्मान को बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने घरेलू नौकरानियों की महापंचायत के आयोजन किए जाने का भी आह्वान किया। उन्हें फोटोयुक्त परिचय पत्र तथा प्रशिक्षण दिए जाने की भी योजना है।

   महाराष्ट्र और केरल की भांति दिल्ली राज्य सरकार घरेलू कामगार एक्ट लागू करने के लिए प्रयास कर रही है। जिनके अंतर्गत कामवाली बाई को साप्ताहिक अवकाश के साथ-साथ अन्य सुविधाएं लेने की भी पात्र होंगी। दिल्ली सरकार के श्रम विभाग द्वारा साप्ताहिक अवकाश, न्यूनतम वेतन तथा अन्य सुविधाओं का खाका तैयार किया जा चुका है। यह लाभ उन सभी कामवाली बाइयों को मिलेगा जो अपना पंजीयन कराएंगी। यदि वह सब यथावत होता है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि कामवाली बाइयों की जीवन दशा में सकारात्मक सुधार होकर रहेगा।

घरेलू जीवन के रोजमर्रा के तंत्र में कामवाली बाइयों के महत्व को किसी भी तरह से कम करके नहीं आंका जा सकता है। चाहे कामकाजी महिलाएं हों या खांटी घरेलू महिलाएं, कामवाली बाइयों के बिना उनके जीवन की तस्वीर पूरी नहीं उभरती है। कम से कम भारत में तो कामवाली बाइयों को बुनियादी आवश्यकता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
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पूजा उपाध्याय
हाथ की लकीरें
उसके हाथों की लकीरें
बिल्कुल मेरे हाथ की लकीरों जैसी थी...
जैसे खुदा ने हूबहू एक सी किस्मतें दी हों हमें

पर मेरी किस्मत में उसका हाथ नहीं था
न उसकी किस्मत में मेरा

कहीं लकीरों के हेर फेर में खुदा ने गलती कर दी थी
इसलिए उसके हाथ में मेरे नाम की लकीर नहीं थी
न मेरे हाथ में उसके नाम की

इसलिए एक होते हुए भी
हमारा इश्क जुदा था...हमारे इश्क को जुदा होना था

मगर जिंदगी के एक मोड़ पर
इन्तेजार करता मेरा हमसफ़र मुझे मिल गया

क्या मैं उम्मीद करूँ की उसे भी उसका हमसफ़र मिलेगा?

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शारदा अरोरा
शबे-गम के इरादों की तरह जलो
जलो तो चरागों की तरह जलो
शबे-गम के इरादों की तरह जलो

किसने देखी है सुबह
आफताब के वादों की तरह जलो

कतरा कतरा काम आये किसी के
किसी काँधे पे दिलासे की तरह जलो

लगा के तीली रौशन हो जाये
सुलगते हुए सवालों की तरह जलो

हवा आँधी तूफाँ तो आयेंगे
टक्कर के हौसलों की तरह जलो

मिट्टी की महक वाज़िब है
खुदाओं के शहर में मसीहों की तरह जलो
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अमित तिवारी
कब किले से मुक्त होगी स्वतंत्रता?
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिये, देश क्या आज़ाद है।
कोठियों से मुल्क की ऊंचाइयां मत आंकिये, असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।।’’
देश की तथाकथित आज़ादी की इस 65वीं वर्षगाँठ के मौके पर अदम गोंडवी की ये पंक्तियाँ सोचने पर मजबूर कर रही हैं। मैं फुटपाथ पर आबाद हिंदुस्तान हूँ। मैं यह तो नहीं कह सकता कि मेरी आवाज सुनो, लेकिन नक्कारखाने में तूती की तरह ही सही मैं बोलना चाहता हूँ। बचपन से किस्से कहानियों में सुनता आ रहा हूँ कि किले में राजा-महाराजा सब रहा करते थे। धरती पर आने में थोड़ी देर कर दी इसलिए राजा-रानी के दर्शन नहीं कर पाया कभी। मेरे आने से पहले ही देश में लोकतंत्र (?) आ गया। लेकिन फिर भी टिकट कटाकर लालकिले जरूर गया हूँ। राजा-रानी तो नहीं लेकिन उनके कमरे, बाथरूम, बगीचे जरूर देखने को मिले। राजा के सैनिक तो नहीं लेकिन स्वतंत्रता की रक्षा में लगे सैनिक जरूर दिखाई दिए। अमित तिवारी जी के इस लेख को पूर्ण रूप में पढ़ने के लिए यहाँ पर कलिक करें
वंदना
लौटना चाहता हूँ
माँ
याद आती है
छवि तुम्हारी
द्रुतगति से
काम में तल्लीन
कहीं नीला शांत रंग
कहीं उल्लसित गेरू से पुती
दीवारें कच्ची
माटी के आँगन पर उभरती
तुम्हारी उँगलियों की छाप थी
या कि रहस्यमयी नियति की
तस्वीर सच्ची
तुम नहीं थी
आज की नारी जैसी
जो बदलती है करवटें रात भर
और नहीं चाहती
परम्परा के बोझ तले
साँसें दबी घुटी सी
पर चाहती है गोद में बेटा
सिर्फ बेटा
और बेटे से आस पुरानी सी
मैं सुनता हूँ उसकी सिसकती साँसे
विविध रंगों के बीच
मुरझाए चेहरों की कहानी कहती
दीवार पर लटकी
किसी महंगी तस्वीर सी
और उधर मैं
फोन के एक सिरे पर
झेलता हूँ त्रासदी
तेरी गोद में
छुप जाने को बैचैन
नहीं कमा पाया मनचाहा
ना ही कर पाया हूँ मनचीती
लौटना चाहता हूँ
तेरे आँचल की छाँव में
डरता हूँ
अगले कदम की फिसलन से
प्रतिनायक बना खड़ा है
मेरा व्यक्तित्व
मेरी प्रतिच्छवि बनकर
क्या सचमुच
मैं यही होना चाहता था
जो आज हूँ
पर सच है
मैं लौटना चाहता हूँ !
मैं लौटना चाहता हूँ !!
लौटना चाहता हूँ !!!
वंदना जी और रचनाएं पढ़ने के लिए यहाँ पर कलिक करें
डा. अशोक प्रियरंजन
रात में रोशन रहने का इतिहास रचता गांव
मेरठ जिले के सरधना क्षेत्र के गांव ईकड़ी ने एक नया इतिहास रच दिया है। इक्कीसवीं सदी में जिस देश के बहुत सारे गांव अभी भी विद्युतीकरण से वंचित हों, वहां ईकड़ी ऐसा गांव है जहां रात में बिजली जाने पर भी अब मुख्य मार्गों पर अंधेरा नहीं रहता है। रात में रोशन रहने के मायने में यह गांव देश के लिए मिसाल बनकर उभर रहा है। यूं तो मेरठ जिला कई चीजों केलिए मशहूर रहा है, कभी नौचंदी मेले के लिए, कभी कैंची तो कभी खेल के सामान केलिए। लेकिन पिछले कुछ समय से यह जिला अपराधों केलिए भी जाना जा रहा है। अपराधियों केलिए रात का अंधेरा वारदातों को अंजाम देने केलिए सबसे मुफीद समय होता है। गांवों में रात में बिजली न होने केकारण अपराधियों केहौसले बुलंद रहते हैं। वारदात के बाद अंधेरे का फायदा उठाकर अपराधी बेखौफ फरार हो जाते हैं। लेकिन ईकड़ी गांव में हुआ प्रयोग कामयाब रहा तो बदमाशों केलिए अब रात में वहां भागना मुश्किल होगा। इसकी वजह यह है कि गांव की स्ट्रीट लाइट बिजली गुल होने के बाद भी इन्वर्टर और बैटरी से जगमग रहेंगी। ईकड़ी शायद हिंदुस्तान का अकेला पहला ऐसा गांव है जहां........
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Kailash C Sharma
इतने  मत  दिखलाओ  सपने
इतने  मत  दिखलाओ  सपने,
आँख   खुले  तो  आंसू   आयें,
अबकी  बार  लगी  गर  ठोकर,
शायद हम फिर संभल न पायें.
हर  रस्ते   ने   था    भटकाया,
हर   मंज़िल   बेगानी  निकली.
हाथ  जिसे  समझे  थे  अपना,
मेंहदी   वहाँ   परायी   निकली.
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Rashmi Ravija
हाथों की लकीरों सी उलझी जिंदगी...
उसकी दुकान नाव्या के कॉलेज के रास्ते में थी. एक दिन, वो केमिस्ट्री प्रैक्टिकल की किताब लेने पहुंची तो पाया ,अरे!! ये तो हुबहू उसके एक पसंदीदा कलाकार सा दिखता है. पर उसके विपरीत बेहद संजीदा. एक पुस्तक पर झुका था. नाव्या को देख भी उस शख्स का चेहरा निर्विकार सा ही रहा. अपने सहायक को पुस्तक निकालने के लिए कहकर, पुनः अपनी किताब पर झुक गया. नज़रें झुकाए-झुकाए ही पैसे लिए और बाकी पैसे काउंटर पर रख दिए. उसे कहीं झटका सा लगा. इस छोटे से शहर में उसकी 'होंडा सीटी' ही बहुत रुतबा जमा जाती थी और उस पर उसकी खूबसूरती की कोई अवहेलना कर सकता था,भला. इसके बाद भी जतन से संवारा गया सुरुचिपूर्ण रूप किसी की भी आँखों को झपकने में कुछ समय लगा ही देता था. प्रोफेसर्स तक एटेंडस लेते वक़्त एक नज़र उस पर जरूर डाल लेते. उसे भी उन सबकी इस आदत की खूब खबर थी...और वो 'येस सर' बोलते ही अदा से सर घुमा...खिड़की के बाहर देखने लगती या फिर झुक कर किसी सहेली से बातें करने लगती. किसी भी दुकान पर उसकी कार रुकती और दुकान वालों में हड़बोंग मच जाती...."ये देखिए मैडम बिलकुल आज ही आया है....आपके लिए ही रख छोड़ा था...किसी को दिखाया तक नहीं...बस आपके लिए ही है".......
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अख्तर खान "अकेला"
हैरतअंगेजः जड़ें निकलने लगीं और पेड़ बनने लगा आदमी...
 इंडोनेशिया के सुदूर गांव में रहने वाला एक मछुआरा एक अजीब समस्या से पीड़ित है। 32 वर्षीय डेडे 'आधा इंसान आधा पेड़' है। दरअसल इस व्यक्ति के शरीर के कई अंगों में पेड़ जैसी संरचनाएं उग चुकी हैं जो हर साल 5 सेंटीमीटर की गति से बढ़ रही हैं।


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5 टिप्‍पणियां:

Vaneet Nagpal
  1. मै भी काव्य मंच में अपनी रचनाओ के साथ जुडना चाहता हूँ,मुझे क्या करना होगा,बताए,

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  2. धीरेन्द्र जी,
    आपकी इजाजत चाहिए | आपकी रचनाओं को यथायोग्य सम्मान के साथ यहाँ पर दिखाया जायेगा | आप अपने और दोस्तों को भी इस के लिए प्रेरित करें |

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  3. वनीत जी नमस्कार मेरी नई रचना के लिये पधारे आपका
    स्वागत है ..
    और हो सके तो मेरी नई रचना का अपने ब्लॉग में लिंक दे!
    आपका आभार !

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  4. मनीष जी आपका अभिप्राय: यदि ये है कि आप इस पेज पर अपनी इस नवरचित रचना को देखना चाहते हैं तो कृपया दोबारा से एक टिप्पणी प्रकाशित करने के लिए कर दीजिए | इस पेज पर आपके इस रचना को उचित सम्मान के साथ प्रस्तुत किये जायेगा |

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  5. वनीत जी मेरी रचना को शामिल करने के लिये एवं बहुत उपयोगी
    सुझाव देने के लिये आपका दिल से धन्यबाद !

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